Tuesday, 27 March 2018

साहित्य”त्रासदी”

हाय ! हे भगवान सोचकर हूँ मैं हैरान
बिरादरी के कई भ्राता की ले ली तूने जान ।
क्यों ख़फा हो गये तुम ?
वेवफा हो गये तुम रह-रह कर लेते रहते हो पत्रकार के प्राण ।
क्या तेरा न्याय यही है ?
क्या ये अन्याय सही है ?
क्यों मिटाने पर तुले हो ?
कलमकार के मान ।
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घबरा गया अब हृदय मातम में है
अन्तर्मन कबतक रुकेगी ये घटनाएँ ?
किसको करें दर्द बयान ?
लहू में है आर्थिक पीड़ा दूजा है
सामाजिक पीड़ा बिगड़ चुका है
भाग्य -पक्ष दिलाओगे कब त्राण ?
निश्छल है
स्वभाव हमारा
जाने भूतल , गगन , सितारा सुध रहती है
हर घटना की क्या तुम भी हो अनजान ?
जब मानवता की प्रतिष्ठा में
लिखते रहते हम रात -दिन
जब तेरी ही प्रतिष्ठा में निज साँसे चलती
हरपल -हरक्षण
फिर वक्र दृष्टि हमपर है क्यों ?
क्या यही है तेरा विधान ?
रहती नहीं सुरक्षा हमारी
तेरे भरोसे
जीवन -गाड़ी
शब्दकार से मुँह मत फेरो
कर दो अब कल्याण ।
तेरी कथा को कौन कहेगा ?
इतनी व्यथा को कौन सहेगा ?
छि:!
शब्द-योद्धा को मत मारो धरो तनिक -सा ध्यान ।

संजय ‘विजित्वर’

via k.times 

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