उच्च शिक्षा में विदेशी साझेदारी और रोजगार के स्वरूप में बदलाव की उम्मीद
रोजगारोन्मुखी बन रही शिक्षा में उच्चतर और पेशेवर शिक्षा का महत्व बढ़ता जा रहा है. इसमें चुनौतियां भी बहुत हैं. सरकारी और निजी शिक्षण संस्थाओं पर निगरानी और उनके पाठ्यक्रम को बेहतर करने पर ध्यान देने की जरूरत है.
दूसरी ओर, बड़ी आबादी और बढ़ते श्रम बल को पिछले कुछ वर्षों से रोजगार मुहैया करा पाना सरकार के लिए बड़ी सिरदर्दी साबित हो रही है. शिक्षा और रोजगार से जुड़े इन्हीं समस्याओं और उम्मीदों को रेखांकित कर रहा है आज का वर्षारंभ ...
अभिजीत मुखोपाध्याय
अर्थशास्त्री
प्रोफेसर अमर्त्य सेन ने एक साक्षात्कार में कहा था कि भारत एकमात्र ऐसा देश है जो अशिक्षित एवं स्वास्थ्यहीन श्रमबल के आधार पर वैश्विक आर्थिक शक्ति होने की कोशिश कर रहा है. किसी भी देश के आर्थिक इतिहास में ऐसा नहीं हुआ है, और प्रोफेसर सेन के विचार से भविष्य में भी ऐसा नहीं हो सकता है.
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और आर्थिक वृद्धि में एक निश्चित संबंध है. गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से श्रमबल में गुणवत्ता आती है तथा इससे उत्पादकता में बढ़ोतरी होती है. यही कारण है कि अधिकतर यूरोपीय देशों ने सार्वभौमिक शिक्षा को अपनाया, जिसे बाद में अमेरिका और जापान ने अपनाया. दक्षिण कोरिया, ताइवान, हांग कांग, सिंगापुर और चीन में यह व्यवस्था लागू हुई.
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