मजहबी दीवार से परे ध्वजवाहक बनते हैं नसरूल
‘ तू हिंदू बनेगा ना मुसलमान बनेगा,
इंसान की औलाद है इंसान बनेगा,
मालिक ने हर इंसान को इंसान बनाया,
हमने उसे हिंदू या मुसलमान बनाया,
तू बदले हुए वक्त की पहचान बनेगा,
इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा.
पूर्णिया : वर्ष 1959 में बनी हिंदी फिल्म ‘धूल के फूल’ में सदाबहार गायक मो रफी के गाये अमर गीत तू हिंदू बनेगा ना मुसलमान बनेगा... को रानीपतरा निवासी मो नसरूल आलम ने अक्षरश: साबित कर दिखाया है.
नसरूल ने जो मजहबी दीवार से परे हट कर सर्वधर्म समभाव का संदेश दिया है वह काबिले तारीफ है. वजह यह है कि मो नसरूल ना केवल चैती दुर्गा पूजा से सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं बल्कि रामनवमी शोभा यात्रा में शामिल होकर रामनवमी ध्वजा का वाहक भी बनते रहे हैं. रेलवे विभाग में छोटी सी नौकरी करने वाले नसरूल की सोच का कैनवास जिस कदर विस्तृत है वह संकीर्ण धार्मिक सोच वाले लोगों के लिए एक नजीर और चुनौती भी है. प्रभात खबर से बातचीत में नसरूल सवालिया लहजे में कहते हैं कि ‘ जब लहू के रंग अलग-अलग नहीं होते तो फिर रामनवमी और ईद के मायने क्यों अलग-अलग होना चाहिए’. बागेश्वरी शक्ति पीठ समिति का है सक्रिय सदस्य. मो नसरूल आलम रानीपतरा स्थित बागेश्वरी शक्तिपीठ कमेटी का बीते पांच वर्षों से सक्रिय सदस्य रहा है.
बागेश्वरी स्थान में चैती दुर्गा पूजा का आयोजन होता है. इस मेला का समापन मंगलवार को हो जायेगा. महत्वपूर्ण यह है कि नसरूल चैती नवरात्र के आरंभ होने के बाद से ही यहां रह कर सक्रिय कार्यकर्ता की भूमिका का निर्वहन करता है. बाहर से आनेवाले श्रद्धालुओं को इस बात का इल्म भी नहीं हो सकता है कि जो शख्स उसकी मददगार बना हुआ है वह इस्लाम धर्म से ताल्लुक रखता है. पूजा समिति के अन्य सदस्यों के साथ रचे बसे मो नसरूल को इससे आत्मिक संतुष्टि मिलती है.
मो नसरूल ना केवल चैती दुर्गा पूजा से सक्रिय रूप से जुड़ा हुआ है बल्कि इसी मौके पर आयोजित होने वाले रामनवमी शोभा यात्रा में भी अपने मित्रों के साथ सक्रिय भागीदारी बीते तीन वर्ष से निभाता रहा है. सोमवार को रानीपतरा से रामनवमी शोभा यात्रा निकाली गयी थी. यह शोभा यात्रा रानीपतरा से निकल कर रजीगंज और दीवानगंज की यात्रा पूरी कर पुन: रानीपतरा में समाप्त हुआ. खास बात यह थी कि मो नसरूल शुरू से लेकर अंत तक इस शोभा यात्रा का हिस्सा बना रहा और उसने ध्वजा वाहक की भी भूमिका निभायी. लिहाजा शोभा यात्रा में मो नसरूल लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बना रहा.
बचपन से ही मिली सर्वधर्म समभाव की सीख
नसरूल के मरहूम पिता रेलवे की नौकरी करते थे. जन्म से ही रेलवे कॉलोनी में दोनों धर्म के लोगों के बीच रहने का मौका मिला. नसरूल ने अगर होली में मस्ती की तो बकरीद में हिंदू दोस्तों को साझीदार बनाया. दुर्गा पूजा मेले में मटरगश्ती की तो ईद में मित्रों के साथ बैठ कर सेवइयां भी खाये. पिता मरहूम खुर्शेद आलम एक जिंदादिल शख्सियत थे और इस वजह से सर्वधर्म समभाव की सीख उसे अपने घर में ही मिली. अम्मी ने भी कभी नसरूल के निजी जिंदगी में मजहबी दीवार खड़ी नहीं की. लिहाजा वक्त बीतने के साथ नसरूल का सोचने का नजरिया विस्तृत होता चला गया.
via parbhat khabar
Labels: khabar seemanchal

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