चाय वाले के बेटे ने राज्यस्तर पर बनायी पहचान
पूर्णिया : ' नयी दुनिया बनाने के नये अन्सुर नहीं आते, यही मिट्टी संवरती है और यही जर्रे उभरते हैं '
कहते हैं कि हौंसले बुलंद हों और साध्य के प्रति इच्छाशक्ति प्रबल हो तो साधन कोई मायने नहीं रखता है. उसी तरह कर्म क्षेत्र में अगर अर्जुन जैसा सारथी हो तो जीत सुनिश्चित मानी जाती है. जिले के धमदाहा प्रखंड के सुदूर ग्रामीण क्षेत्र के रहने वाले एक चाय दुकानदार के बेटे ने राज्यस्तरीय स्कूली विज्ञान प्रतियोगिता में जो अपनी पहचान स्थापित की है, वह अन्य साधनहीन छात्रों के लिए भी नजीर बन गया है.
पूर्णिया : ' नयी दुनिया बनाने के नये अन्सुर नहीं आते, यही मिट्टी संवरती है और यही जर्रे उभरते हैं '
कहते हैं कि हौंसले बुलंद हों और साध्य के प्रति इच्छाशक्ति प्रबल हो तो साधन कोई मायने नहीं रखता है. उसी तरह कर्म क्षेत्र में अगर अर्जुन जैसा सारथी हो तो जीत सुनिश्चित मानी जाती है. जिले के धमदाहा प्रखंड के सुदूर ग्रामीण क्षेत्र के रहने वाले एक चाय दुकानदार के बेटे ने राज्यस्तरीय स्कूली विज्ञान प्रतियोगिता में जो अपनी पहचान स्थापित की है, वह अन्य साधनहीन छात्रों के लिए भी नजीर बन गया है.

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