Saturday, 24 March 2018

मुसलमान के रक्तदान से बची हिंदू महिला की जान, क्लब का गठन कर 37 वर्ष से कर रहे रक्तदान

मुसलमान के रक्तदान से बची हिंदू महिला की जान, क्लब का गठन कर 37 वर्ष से कर रहे रक्तदानसीतामढ़ी : अपना स्वार्थ साधने के लिए समाज में सांप्रदायिक तनाव की गंदगी बिखेरने वाले लोगों के लिए इंसानियत का पैगाम देने वाले कैसर हुसैन राजा एक जीते-जागते मिसाल हैं. उनकी रग-रग में इंसानियत दौड़ती है. स्थानीय लोगों की नजर में वे नाम के नहीं, बल्कि सही में समय-समय पर बगैर किसी लालच के मानवता का परिचय देने वाले सामाजिक कार्यकर्ता हैं. शनिवार को भी कुछ ऐसा ही हुआ. 

बिहार में सीतमढ़ी जिले के बैरगनिया प्रखंड से आगे कुंडवा-चैनपुर में उच्च विद्यालय में शिक्षिका के पद पर कार्यरत मेनका कुमारी को गंभीर स्थित में शहर स्थित एक निजी क्लिनिक में भरती कराया गया. चिकित्सकों ने खून की कमी बताया. मेनका का खून ओ निगेटिव है. मेनका के रिश्तेदारों ने सामाजिक कार्यकर्ता अभिषेक उमंग से संपर्क बनाया. अभिषेक सदर अस्पताल स्थित ब्लड बैंक पहुंचे, तो पता चला कि ओ निगेटिव ब्लड नहीं है. तब उन्होंने फेसबुक व व्हाटसएप पर मेनका के विषय में जानकारी देते हुए ओ निगेटिव ब्लड देने की मांग की. कोई आगे नहीं आया. तब अभिषेक ने अब तक 28 से अधिक बार रक्तदान कर चुके शहर के मेनरोड स्थित अनवर मंजिल वार्ड नंबर-19 निवासी कैसर हुसैन राजा से संपर्क किया. वह खून देने के लिए तुरंत तैयार हो गये. राजा के रक्तदान से मेनका की जान बची. मेनका के पिता राम मिलन सिंह भी सरकारी स्कूल में शिक्षक के रूप कार्यरत हैं.

1981 से युवाओं की टोली कर रही रक्तदान
सीतामढ़ी जिले की स्थापना 11 दिसंबर 1972 को हुई थी. जिले में ब्लड बैंक नहीं रहने के कारण कई लोगों की जान जाते देख शहर के हिंदू व मुसलमान समुदाय के युवाओं की टोली ने जेसिस इंटरनेशनल क्लब की स्थापना की. उन्होंने सदर अस्पताल प्रबंधन से संपर्क कर रक्तदान की इच्छा व्यक्त करते हुए रक्तदान के लिए इच्छुक 20 युवाओं की सूची उपलब्ध करा दी. इसके बाद अस्पताल में भरती होने वाले मरीजों को खून चढ़ाने की आवश्यकता महसूस होने पर युवाओं को बुलाया जाने लगा. 

सैकड़ों लोगों को रक्तदान कर चुके युवाओं में शामिल श्री हुसैन के अलावा शहर के अजय शर्राफ, कमलेश शर्राफ, डाॅ अरूण सिंह, संतोष अग्रवाल, उमेश हिसारिया, उमेश ढनढनिया, दीपक बंसल, शकील अहमद व खुर्शीद अनवर समेत अन्य लंबे समय तक रक्तदान करने के बाद पारिवारिक व व्यावसायिक जीवन में बंध गये. क्लब तो भंग हो गया, लेकिन अब भी क्लब में शामिल रहे युवाओं की भावना मानवता से जुड़ी है. जरूरत पड़ने पर अब भी वे रक्तदान से पीछे नहीं हटते. उस वक्त हिंदू व मुसलमान युवकों ने आपसी भाइचारा ऐसा बना कर रखा था, जो शहर के लिए नजीर से कम नहीं था.

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