Monday, 13 November 2017

संघर्ष 4 लौचा पुल



जब कभी देखता हुँ ,अधुरा लौचा पुल। ।
चुभता है दिल मे, जैसे कोई शुल (कांटा) ।।
टेढ़ागाछ का है दर्द, क्या समझेगा ज़माना ।
कस्ती मे निकले बरात, कस्ती मे ही जनाज़ा ।।
जब कभी छुट जाए, कस्ती घाट से ।
रोती माँ इधर, तड़पती है बेटी उस पार से ।।
यक़ीन था "उसके" वादों पर, यही थी हमारी भुल ।
शायद इसलिए आज भी ,अधुरा है लौचा पुल ।।
हौसला अभी ज़िन्दा है, इस ज़मीन के तले ।
ज़िद है "आसिफ" ,पुल बने बरसात से पहले ।।
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आसिफ रहमान " आसिफ "
" संघर्ष 4 लौचा पुल "
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